सौरव गांगुली और एमएस धोनी की कहानी

भारतीय क्रिकेट में जब भी सबसे सफल और प्रभावी कप्तान की बात होती है, तो सबसे ऊपर सौरव गांगुली और एमएस धोनी का नाम आता हैं। जहां सौरव गांगुली ने एक शानदार टीम बनाई और आंख से आंख मिलाकर लड़ना सिखाया, वही धोनी ने टीम इंडिया को कई आईसीसी ट्रॉफी जिताई।

दोनों ही अपने-अपने समय के बेहतरीन कप्तान और खिलाड़ी रहे हैं। सौरव गांगुली की कप्तानी में टीम इंडिया ने 2003 में क्रिकेट वर्ल्ड कप का फाइनल खेला और उप-विजेता रहे। धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया ने साल 2011 में 27 साल के लम्बे अंतराल के बाद वर्ल्ड कप जीता।

सौरव गांगुली और एमएस धोनी की कहानी की शुरुआत

क्रिकेट के गलियारों में अक्सर गांगुली और धोनी की शैली और कप्तानी की तुलना होती रहती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि धोनी को “थाला” बनाने में प्रिंस ऑफ कोलकाता अर्थात दादा का बहुत बड़ा हाथ रहा है। गांगुली के इस कदम ने ना सिर्फ धोनी (MS Dhoni) बल्कि भारतीय क्रिकेट की दशा और दिशा दोनों बदल दी।

धोनी को टीम इंडिया में लाने के लिए सौरव गांगुली का एक मास्टरस्ट्रोक काम आया। साल 2003-04 के आस-पास टीम इंडिया को एक ऐसे विकेटकीपर की तलाश थी, जो कीपिंग के साथ-साथ निचले क्रम में ताबड़तोड़ बल्लेबाजी कर सके। ऐसे में किसी ने गांगुली को झारखण्ड के लम्बे बालों वाले महेंद्र सिंह धोनी के बारे में बताया।

उस समय युवा धोनी बेहतरीन विकेटकीपिंग के साथ-साथ आक्रामक बल्लेबाजी के लिए भी जाने जाते थे। तब सौरव गांगुली खुद जमशेदपुर धोनी को देखने गए (यह बात गांगुली ने स्वयं एक पॉडकास्ट में बताई). धोनी ने टीम इंडिया के कप्तान गांगुली को बेहद प्रभावित किया।

उसके बाद धोनी को इंडिया ए (India A) में चुना गया। पूरी तरह से यह कहना कि धोनी को टीम इंडिया में लाने का श्रेय सौरव गांगुली को जाता है, यह सही नहीं होगा। लेकिन यह सत्य है कि धोनी का टैलेंट देखकर गांगुली प्रभावित हुए और उन्होंने ने उस समय के मुख्य चयनकर्ता किरण मोरे को धोनी का नाम सुझाया।

धोनी के टीम इंडिया में आने से पहले विकेटकीपिंग का जिम्मा राहुल द्रविड़, पार्थिव पटेल और दिनेश कार्तिक जैसे खिलाड़ी संभाल रहे थे। राहुल द्रविड़ का वर्कलोड कम करने के लिए टीम मैनेजमेंट ने महेंद्र सिंह धोनी को एक बेतरीन विकल्प माना। सौरव गांगुली और एमएस धोनी की कहानी की केमिस्ट्री की शुरुआत यहीं से होती है।

धोनी का टीम इंडिया में चयन और डेब्यू

दिसंबर 2004 में भारतीय टीम का बांग्लादेश दौरा तय था। चयनकर्ता और गांगुली के लिए धोनी को परखने का यही अच्छा मौका था। जब बांग्लादेश दौरे के लिए टीम इंडिया का ऐलान हुआ तो एक नाम ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा और वो था महेंद्र सिंह धोनी।

लम्बे बालों और ताकतवर कद वाले इस खिलाड़ी पर सभी की नजर थी। 23 दिसम्बर 2004 को भारत का बांग्लादेश के खिलाफ पहला वनडे (ODI) मैच था और इस मैच में टीम इंडिया में महेंद्र सिंह धोनी का डेब्यू हुआ। सबकी नजर धोनी पर थी, लेकिन इस मैच में बिना कोई गेंद खेले धोनी शून्य (0) पर रन आउट हो गए।

इस द्विपक्षीय सीरीज के अगले मैचों में भी धोनी को मौका मिला लेकिन उनका बल्ला पूरी तरह से खामोश रहा। धोनी ने शुरुआती 4 मैचों में क्रमशः 0, 12, 7 और 3 रन बनाए।

प्रारंभिक चार मैचों में पूरी तरह से फ्लॉप होने के बाद धोनी के टीम इंडिया में सिलेक्शन पर सवाल उठने लगे और सभी को लगा की अब धोनी को ज्यादा मौके नहीं मिलेंगे। उस समय भारतीय टीम के मुख्य चयनकर्ता रहे किरन मोरे ने बताया कि चयनकर्ता धोनी को टीम इंडिया से बाहर कर, पुनः घरेलु क्रिकेट खिलाना चाहते थे।

लेकिन चयनकर्ता और धोनी के बीच में टीम इंडिया के कप्तान सौरव गांगुली अड़िग होकर खड़े हो गए। गांगुली ने कहा कि इस युवा खिलाड़ी में बहुत प्रतिभा है, अभी इसको और मौके मिलने चाहिए। गांगुली का यह भरोसा धोनी के क्रिकेट करियर के लिए संजीवनी बन गया।

गांगुली का त्याग और धोनी के लिए टर्निंग पॉइंट

साल 2005 में पाकिस्तान की टीम के साथ द्विपक्षीय श्रंखला खेली जा रही थी। 5 अप्रैल 2005 को विशाखापट्नम में भारत बनाम पाकिस्तान, दूसरा वनडे मैच खेला जा रहा था। भारतीय टीम का बल्लेबाजी क्रम फिक्स था। सचिन तेंदुलकर के साथ वीरेंद्र सहवाग ओपनिंग करते थे और तीसरे नंबर पर सौरव गांगुली बल्लेबाजी करते थे।

गांगुली नंबर 3 पर बल्लेबाजी करने वाले दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाजों में से एक थे। नंबर 3 पर बेहतरीन बल्लेबाजी का सबूत उनके आंकड़े थे। मैच शुरू होने से पहले गांगुली धोनी के पास गए और बोले आज तुमको नंबर 3 पर बल्लेबाजी करनी है। जाओ और बिना दबाव के अपना स्वाभाविक गेम खेलो।

गांगुली जानते थे कि अगर धोनी को नंबर 6 या 7 पर बल्लेबाजी करने भेजा गया तो खुद को साबित करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा। गांगुली ने धोनी के लिए अपने पसंदीदा बल्लेबाजी क्रम को त्याग दिया।

जब हिन्दुतान में गूंज उठा धोनी-धोनी

पाकिस्तान के खिलाफ इस मैच में भारत पहले बल्लेबाजी कर रहा था। सचिन-सहवाग की विश्व विख्यात जोड़ी मैदान पर थी, दूसरी तरफ पाकिस्तान की धारदार गेंदबाजी। पाकिस्तान टीम में मोहम्मद शामी, नावेद राणा और मोहमद हफीज जैसे गेंदबाज थे। भारत ने 26 रन के स्कोर पर महान सचिन का विकेट खो दिया।

सचिन के आउट होने के बाद तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए महेंद्र सिंह धोनी को जाते देखकर हर कोई हैरान था। लम्बे बालों वाला युवा धोनी मैदान पर एक नया इतिहास लिखने के लिए और खुद को साबित करने का संकल्प लेकर क्रीज पर पहुंचा।

धोनी ने शुरुआत से ही आक्रामकता दिखाई और पाकिस्तानी गेंदबाजों पर कहर बरपाने लगे। इस मैच में धोनी ने 123 गेंदों पर 148 रनों की ताबड़तोड़ पारी खेली। धोनी की इस पारी में 15 चौके और 4 गगन चुम्बी छक्के शामिल थे। यहाँ पर धोनी ने खुद के चयन के साथ-साथ सौरव गांगुली के उस फैसले को भी सही साबित कर दिया, जिसके दम पर उनको टीम इंडिया में जगह मिली।

इन दिग्गजों के सफर का ही नतीजा था कि आज पुरे भारत में धोनी का नाम गूंजने लगा और टीम इंडिया की विकेटकीपर बल्लेबाज की खोज पूरी हुई।

गांगुली का आखिरी मैच और भावुक विदाई

सौरव गांगुली और एमएस धोनी के बीच एक भावनात्मक रिश्ता बन चूका था। साल 2008 की बात है, जब गांगुली अपने कॅरियर का आखिरी टेस्ट मैच खेल रहे थे।

पहले कोच ग्रेग चैपल से विवाद के बाद गांगुली को कप्तानी से हटा दिया गया था और उन्होंने मुश्किल से टीम में वापस जगह बनाई। इस समय धोनी टीम इंडिया के टी-20 और वनडे कप्तान बन चुके थे जबकि टेस्ट में अनिल कुंबले टीम इंडिया के कप्तान था। तीसरे टेस्ट मैच के बाद कुंबले ने सन्यास ले लिया।

नवम्बर, 2008 में अनिल कुंबले के सन्यास के बाद, इस मैच में पहली बार महेंद्र सिंह धोनी को टेस्ट में कप्तानी करने का मौका मिला। यह मैच गांगुली के लिए जितना भावुकता वाला था, धोनी के लिए भी उतना ही। क्योंकि धोनी को टीम इंडिया में लाने वाले गांगुली का यह आखिरी टेस्ट मैच था।

इस मैच में सौरव गांगुली और एमएस धोनी के बीच एक बार फिर ऐसा देखने को मिला, जिससे क्रिकेट मैदान का माहौल ही बदल गया। भारत जीत के करीब पहुँच गया और मैच अपने आखिरी चरण में था। भारत जीत के करीब था तो दूसरी ओर गांगुली के साथ-साथ दर्शकों और भारतीय क्रिकेट फैन की आंखे भी नम थी।

वजह थी सौरव गांगुली का आखिरी इंटरनेशनल मैच और उसमें भी कुछ समय बचा था। इस समय धोनी गांगुली के पास गए और उनको कप्तानी करने के लिए कहा। यह गांगुली के लिए आसान नहीं था। गांगुली की नम आँखे सब कुछ बयां कर रही थी।

जैसे ही गांगुली ने कप्तानी संभाली और अपने अनुसार फील्डिंग लगाई, मैदान पर मौजूद दर्शक भावुक हो गए। सौरव गांगुली और एमएस धोनी की कहानी का यहाँ अंत होने वाला था। धोनी ने यह करके दिखाया कि उनके मन में गांगुली के लिए कितना प्रेम और सम्मान था।

धोनी ने गांगुली की विरासत को आगे बढ़ाते हुए टीम इंडिया को कई आईसीसी ट्रॉफी जिताई। गांगुली ने अपनी कप्तानी में कई युवा खिलाड़ियों पर दांव लगाया जिसमें युवराज सिंह, हरभजन सिंह, ज़हीर खान, वीरेंद्र सहवाग और महेंद्र सिंह धोनी।

दोनों का सफर कुछ टूर्नामेंट जीतने या शतकों की कहानी नहीं है, यह कहानी है एक महान लीडर (Saurav Ganguly) की, जिसने युवा खिलाड़ियों पर भरोसा कर टीम इंडिया को मजबूती प्रदान की। यह कहानी है एक महान शिष्य की जिसने सफलता के शिखर पर होने के बाद भी अपने गुरु के योगदान को नहीं भुलाया।

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